









बाड़ी माता मंदिर, जिसे बाड़ी माता तीर्थधाम के नाम से भी श्रद्धापूर्वक जाना जाता है, कई पीढ़ियों से श्रद्धा, आस्था, परंपरा, वीरता, त्याग और सेवा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उपलब्ध ऐतिहासिक एवं परंपरागत विवरणों के अनुसार बाड़ी माता की प्राचीन प्रतिमा संवत् 1514 में बूंदी जिले के झराणा गांव से बाड़ी लाई गई थी। समय के साथ यह पवित्र स्थान एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन एवं पूजन के लिए यहां पहुंचते हैं।
बाड़ी माता धाम का इतिहास केवल मंदिर की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसके साथ स्थानीय धार्मिक परंपराएं, देवा जी झुंझार और गोमा सती की वीरगाथा, निष्ठावान सेवा परंपरा तथा गौसेवा का एक समृद्ध इतिहास जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि बाड़ी माता तीर्थधाम श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।
एक गृहस्थ सन्यासी, उच्च राजपत्रित पदों पर आसीन होते हुए भी सम्पूर्ण कामनाओं का परित्याग कर, आधाशक्तिः जगद्जननी माँ भगवती दुर्गा की आराधना में सर्वभावेन् समर्पित व्यक्तित्व, गौभक्त, भरे पूरे परिवार के मोह से निवृत्त हो सर्व समाज की पीड़ा हरने हेतु जीवन समर्पित, एक निर्जन, अस्त व्यस्त स्थान पर बाड़ी माता को एक भव्य स्थल में रूपान्तरित कर उसके वैभव को सर्वत्र प्रसारित करने में अनोखा प्रयास निष्काम, कर्मठ, त्यागमय जीवन, कठोर श्रम बिन्दुओं से सींचकर कुसुमित पल्लवित करने का प्रण सेवाभावी सरल, मृदुल स्वभाव, सादगी पूर्ण जीवन का श्रेष्ठ उदाहरण- ऐसे महामानव का जन्म सीकर जिले का नेछवा गांव में कार्तिक सुदी चवदस सम्वत् 1992 दि. 9 नवम्बर 1935 में गुरुदेव का जन्म हुआ । इनकी माता का नाम श्रीमती राधादेवी पिता श्री रूपचन्द थे । इनकी पत्नी श्रीमती सावित्री एवं दो पुत्र व दो पुत्रियां है ।